करीकुलर और कोकरीकुलर ऐक्टिविटीज़


हमारे कोलेज में पढ़ाई के अलावा भी बहुत कुछ होता था।

स्कूली शिक्षा में क्लास के अंदर होने वाली पढ़ाई के अलावा एक्स्ट्रा करीकुलर और कोकरीकुलर ऐक्टिविटीज़ का बहुत महत्व होता है।चम्पा अग्रवाल इंटर कोलेज में दिन की शुरुआत असेंबली से होती थी जिसमें शामिल होना हर विद्यार्थी ओर शिक्षक के लिए अनिवार्य होता था।सबसे पहले क्लास में हाज़िरी ली जाती थी। फिर सारे विद्यार्थीयों को एक पंक्ति में असेम्बल ग्राउंड पर जाते थे। बिलकुल सही समय पर प्रार्थना प्रभारी श्री जीवन लाल चतुर्वेदी बार बार सीटी बजकर पंक्तियों को सीधा कराते थे।आख़िरी सीटी के बाद प्रार्थना शुरू होती थी। संगीत अध्यापक श्री केलकर हार्मोनीयम बजाते थे और ड्रम को उनका कोई चेला बजाता था।प्रार्थना हम सभी गाते थे “पितु मारू सहायक स्वामी सखा,तुम्हीं एक नाथ हमारे हो”। यह सुमधुर एवं भावपूर्ण प्रार्थना हिंदी कवि श्री प्रताप नारायण मिश्रा की लिखी हुई थी।प्रार्थना के बाद हम एक प्रतिज्ञा बोलते थे जो शुरू होतीं थी ” भारत मेरा देश है और सभी भारतवासी मेरे भाई बहन है।” इसके बाद ज़रूरी नोटिस बताए जाते थे। अक्सर प्राचार्य श्री कन्हैया लाल गुप्ता कुछ सीख देते थे।अंत में राष्ट्रगान से समापन होता था।
मुझे लगता हैकि स्कूल के श्रेष्ठ अनुशासन की यह बढ़ी मजबूट नीव थी।अस्सेंबलई से वापस जाते समय भी हम सब पंक्तिबद्ध हो कर ही जाते थे।

 

स्कूल में खेल का मैदान तो नहीं था । उसके लिए भूतेश्वर पर स्थित मैदान पर जाना होता था जो की स्कूल ने लीज़ पर ले रखा । बाद में यह मैदान भी नहीं रहा। यही पर NCC और PSD की अभ्यास करायी जाती थी।स्कूल के कैम्पस में कबड्डी के लिए कई स्थान थे।कुछ लोग छतों पर जाकर शीतकाल में कबड्डी खेलते थे। स्कूल में स्काउट बहुत सक्रिय था जिसके प्रभारी श्री धर्मेन्द्र विद्यार्थी थे।स्कूल का एक सेवादल था जो मेलों में कैम्प लगाकर तीर्थ यात्रियों के मदद करते थे।मुझे सब से जियादा आनंद विद्यार्थी संघ में आता था जो एक तरह से छात्र संसद की तरह काम करते थी।इसके प्रभारी श्री श्री प्रपन्नाचार्य जी थे। यह एक मोडल संसद की तरह काम करती थी।
स्कूल में मस्ती के कुछ ख़ास समय और स्पॉट होते थे। लंचकाल से पहले हमें कुछ नाश्ता मिलता था जिसे मोनीतर महोदय बाँटते थे।नाश्ते को जिस जगह से वितरित करते थे, उसके इ इंचार्ज श्री के सी जैन होते थे। लंच काल में हम सभी अपना टिफ़िन खोल कर पेट पूजा करते थे।कभी कभी घर से टिफ़िन ना मिलने पर दो आने मिलते थे कचोरी खाने के लिए । सभी बालकों के लिए परभाती की कैंटीन एक बहुत बड़ा आकर्षण था।अध्यापक भी लंच के दौरान चाय पीने या नाश्ता करने जाते थे। इस के पास में एक फ़्रूट्स की चाट की स्टॉल थी। यहाँ पर फलों की चाट के अलावा बेर,इमली और मसाला लगा हुआ नींबू भी मिलता था।इस स्टॉल को एक सरदारजी चलाते थे|

 

इस सबके अलावा बहुत से लिटरेरी और cultural programme प्रसिद्ध मंदो बाई हॉल में होते रहते थे। इस सभागार के हम सब दीवाने थे। तो इस तरह चम्पा अग्रवाल इंटर कॉलेज में हम सबने ज़िन्दगी के पहले पाठ सीखे।