Story of Alumni

आशुतोष चतुर्वेदी

singh

हालांकि मेरा जन्म फिरोजाबाद में हुआ लेकिन पिता डॉक्टर महेश चंद्र चतुर्वेदी मथुरा के किशोरी रमण महाविद्यालय में अर्थशास्त्र विभाग के
अध्यक्ष थे इसलिए जीवन के आरंभिक बेहतरीन 20 साल मथुरा में गुजरे. मेरे लिए मथुरा को याद करने का अर्थ है अपने जीवन के मर्म को जानना. मथुरा की
खूबी है हेलन्त बोला, वचनान्त गारी, करील वृक्ष कूप जल खारी. बेबाकी यहां के माहौल में है. जैसा कि हर शहर का एक मिजाज होता है और उसका असर वहाँ के रहने वालों पर पड़ता है, मेरा मानना है कि मुझ पर भी मथुरा के मिजाज का असर पड़ा. यहां पर यमुना के घाट, मंदिरों-देवालयों में अर्चना-पूजा,
शंख-घंटा घड़ियाल के बीच में रहकर विज्ञान पढ़ना स्वयं में बेहद मुश्किल काम था. अजीब सम्मिश्रण था. लेकिन उसका भी अपना एक खास आनंद था.मेरा पिता किशोरी रमण महाविद्यालय में थे इसलिए मेरा दाखिला किशोरी रमण इंटर कॉलेज में कराया गया. लेकिन कन्हैया लाल गुप्तजी के प्रताप से चंपा अग्रवाल का नाम पूरे शहर में था. मैं अच्छा विद्यार्थी था और मेरे कई साथियों ने आठवीं के बाद तय किया कि दसवीं और बारहवीं बोर्ड की परीक्षा यदि चंपा अग्रवाल से पूरी की जाये तो अच्छे अंक आ सकते हैं. जब मैंने अपनी यह इच्छा पिता को बतायी कि मैं चंपा अग्रवाल इंटर कॉलेज में पढ़ना चाहता हूं तो उन्हें इस पर खासी आपत्ति जतायी. खैर, मां के सहयोग से किसी तरह उन्हें मनाया गया और मैंने 1975 में नौंवी में चंपा अग्रवाल में दाखिला ले लिया. यह स्कूल का ही प्रताप था कि मैंने सन् 77 में हाईस्कूल और इसके बाद इंटरमीडिएट की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की. इसी नींव की बदौलत मैं बीएससी और एमएससी प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कर पाया.

पत्रकारिता के क्षेत्र में आने की कहानी भी विचित्र है. जुलाई, 1975 की बात है, उन दिनों मथुरा और आसपास के इलाके में भारी बाढ़ आई हुई थी. मैं अपने दोस्तों के साथ रोजाना उसे देखना जाता था. इसका पता जब दादाजी यानि पत्रकार शिरोमणि पंडित बनारसी दास चतुर्वेदी को लगा तो जैसी कि उनकी आदत थी, उन्होंने निर्देश दिया कि बाढ़ का विस्तृत विवरण लिख कर भेजो. मैंने विस्तार से बाढ़ के प्रकोप और हम जैसे तमाशबीनों के बारे में उन्हें लिख कर भेजा, वे इस विवरण को पढ़कर अत्यंत प्रसन्न हुए और इसके जवाब में उनका लाल और नीली स्याही से लिखा पोस्टकार्ड आया कि जो आज भी मेरे पास सुरक्षित है- तुम अच्छा लिख लेते हों और तुममें पत्रकार बनने की गुण मौजूद हैं. बस उनके इस आशीर्वचन ने पत्रकार बनने की नींव रख दी.

हालांकि सन 1984 में जब मैंने माया पत्रिका में बतौर प्रशक्षु पत्रकार ज्वाइन किया तो उस समय पत्रकारिता कैरियर नहीं थी. दुर्भाग्य या सौभाग्य
से मैंने हाईस्कूल, इंटर, बीएससी और एमएससी चारों डिग्रियां प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की थी. पिछली पीढ़ी में सभी लोग अध्यापन से जुड़े थे, सभी
चाहते थे कि मैं अध्यापक बनूं पर मुझे तो पत्रकार बनने का जुनून था और परिवार के न चाहते हुए भी मैंने मित्र प्रकाशन को ज्वाइन कर लिया. इस तरह
शुरू हुई मेरी पत्रकारिता की यात्रा. उसके बाद इंडिया टुडे, संडे आब्जर्वर, जागरण, बीबीसी लंदन,अमर उजाला के कार्यकारी
संपादक और प्रभात खबर के प्रधान संपादक तक की यात्रा भारी उतार चढ़ाव भरी रही. ऐसे भी कई क्षण आए जब पत्रकारिता कैरियर बनाने के फैसले पर सवाल खड़े होते हुए दिखे, लेकिन जैसा कहा जाता है कि अंत भला तो सब भला.